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Friday, 11 January 2013

करो विवेकानंद की, चर्चा मेरे मित्र-



सुदर्शन आदर्श संन्‍यासी युवा

Kulwant Happy 

जिए विवेकानंद जी, कुल उन्तालिस वर्ष ।
हुवे डेढ़ सौ वर्ष हैं, उत्सव मने सहर्ष ।
उत्सव मने सहर्ष, युवा भारत सन्यासी ।
 वाणी सहज प्रभाव, आत्मा तृप्ते प्यासी ।
एक एक सन्देश, आज से  पुन: मांजिये ।
भारत माता पूज, चित्र कुल भव्य साजिए ।


चर्चा करो मगर कैसे और किसकी ?


vandana gupta 

करो विवेकानंद की, चर्चा मेरे मित्र |
युवा वर्ग के हृदय में, होय स्थापित चित्र |
होय स्थापित चित्र, ढेढ़ सौ साल हो रहे |
प्रासंगिक है सीख, समय समय पर जो कहे |
हे भारत के युवा, देश को अब मत अखरो |
पूरे कर कर्तव्य, शपथ लेकर मत मुकरो |


 SADA 
सत्य सर्वथा तथ्य यह, रोज रोज की मौत |
जीवन को करती कठिन, बेमतलब में न्यौत |
बेमतलब में न्यौत , एक दिन तो आना है |
फिर इसका क्या खौफ, निर्भया मुस्काना है |
कर के जग चैतन्य, सिखा के जीवन-अर्था |
मरने से नहीं डरे, कहे वह सत्य सर्वथा ||




सी बी आई ली पकड़, नाई जब्त गुलेल।
गुप्ता जी की डायरी, दे मुश्किल में ठेल ।
दे मुश्किल में ठेल,  जांच हो रही भयंकर।
 किससे किससे मेल, बोल दे क्या है चक्कर  ।
सुनते स्विस हर बाल , खड़ा सीधा हो जाता  ।
आसानी से तभी, जानिये बाल कटाता ।।


पैमाने में भरकर अलसाये दर्द को, इस तरह न छलकाया करो..

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 

अंतर्मन में ऐक्य है, तनातनी तन माय |
प्यारी सी यह गजल दे, फिर से आग लगाय |
फिर से आग लगाय, बुलाना नहीं गवारा |
रहा खुद-ब-खुद धाय, छोड़ के धंधा सारा |
आँखों में इनकार, मगर सुरसुरी बदन में |
रविकर कर बर्दाश्त, आज जो अंतर्मन में ||


मिथ या यथार्थ ? मोटे अनाज हमेशा अच्छे ?

Virendra Kumar Sharma 
साजे गोला ऊन का, गुड़ का बनता  पाग |
तिलकुट मोटा बाजरा, ज्वार चना कुल भाग |
ज्वार चना कुल भाग, ठण्ड तो बाघ बन रही |
एक आसरा आग, जला के  होय बतकही |
दादा दादी कहाँ,  सुनाते किस्से ताजे  |
लट्टू कंचा गोल,  हाथ मोबाइल साजे   ||


सीमा पर उत्पात हो, शत्रु देश का हाथ ।

फेल खूफिया तंत्र है, कटते सैनिक माथ ।

कटते सैनिक माथ, रहे पर सत्ता सोई ।

रचि राखा जो राम,  वही दुर्घटना होई ।

इत नक्सल आतंक, पुलिस का करती कीमा ।

पेट फाड़ बम प्लांट, पार करते अब सीमा ।।  

शब्दों से आक्रोश को, व्यक्त करे आकाश ।
देश रसातल में धंसे, देख लाल की लाश ।
देख लाल की लाश, अनर्गल बकती सत्ता ।
लेकिन पाकी फांस, घुसे हरदम अलबत्ता ।
इत नक्सल दुर्दांत, उधर आतंकी पोसे ।
करिए अब तो क्रान्ति, भावना से शब्दों से ।।



पाकी सिर काटे अगर, व्यक्त सही आक्रोश ।
मरे पुलिस के पेट में, नक्सल दे बम खोंस ।


नक्सल दे बम खोंस, आधुनिक विस्फोटक से ।

करे धमाका ठोस, दुबारा पूरे हक़ से ।


अन्दर बाहर शत्रु, बताओ अब क्या बाकी ।

नक्सल पीछे कहाँ, तनिक आगे है पाकी ।।



पाकी दो सैनिक हते, इत नक्सल इक्कीस ।

रविकर इन पर रीस है, उन पर दारुण रीस ।
उन पर दारुण रीस, देह क्षत-विक्षत कर दी ।

सो के सत्ताधीश, गुजारे घर में सर्दी ।

बाह्य-व्यवस्था फेल, नहीं अन्दर भी बाकी ।

सीमोलंघन खेल, बाज नहिं आते पाकी ।। 
 

 लेख लिखाते ढेर से, पढ़िए सहज उपाय ।

रेप केस में सेक्स ही, पूरा बदला जाय ।
पूरा बदला जाय, भ्रूण हत्या से बचकर ।

भेदभाव से उबर, करे सर्विस जब पढ़कर ।

दुर्जन से घबराय, छोड़ दिल्ली जो जाते ।

भरपाई हो मित्र, रहो फिर लेख लिखाते ।।



"पत्थर दिल कब पिघलेंगे?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आई मौनी अमाँ है, तमा तमीचर तीर |
नारी मरती सड़क पर, सीमा पर बलवीर |
सीमा पर बलवीर, देश में अफरा तफरी |
सत्ता की तफरीह, जेब लोगों की कतरी |
बेलगाम है लूट, समंदर पार कमाई |
ढूँढ़ दूज का चाँद, अमाँ यह लम्बी आई || 




 

5 comments:

  1. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (13-12-2013) को (मोटे अनाज हमेशा अच्छे) चर्चा मंच-1123 पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  4. आपको मकर संक्राति की बधाई।

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